पितृ उद्धार की साधना ने भक्त प्रहलाद को किया अमर : स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती
करहां, मऊ। गीता जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में आम्रपाली वैदिक शोध संस्थान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में तीसरे दिवस पर परमपूज्य परमहंस परिव्राजकाचार्य स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती ने भक्त प्रहलाद की दिव्य कथा का विवेचन किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर को प्रसन्न करना सरल है, लेकिन जन्मदाता पिता को अधोगति से बचा लेना असाधारण और दुर्लभ कार्य है, जिसका अद्भुत उदाहरण भक्त प्रहलाद ने प्रस्तुत किया। कथा आरंभ से पूर्व प्रयागराज से आए भजन-साधक आचार्य शुभम, अमित मिश्र, हिमांशु तिवारी, विकास पांडेय, सुधांशु मिश्र आदि ने मधुर भजनों से वातावरण को पूर्णतः भक्तिमय बना दिया। मुख्य यजमान उर्मिला सिंह द्वारा विधिवत व्यासपीठ पूजा के बाद कथा का शुभारंभ हुआ।
कथा विस्तार में स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि श्रीमद्भागवत ईश्वर-भक्ति और पितृ-भक्ति दोनों का अद्वितीय संगम है। भक्त प्रहलाद की सर्वत्र भगवद-दृष्टि ने खंभे से नरसिंह भगवान के अवतरण को संभव किया। ईश्वर की सत्ता पृथ्वी से लेकर पाताल तक प्रत्येक कण में व्याप्त है और भक्त कहीं भी घर, वन, तीर्थ या देवालय आदि में ईश्वर का स्मरण करे, परमात्मा उसकी पुकार अवश्य सुनते हैं। उन्होंने बताया कि प्रहलाद की पितृ-भक्ति और करुणा देखकर नरसिंह भगवान प्रसन्न हुए। प्रहलाद ने पिता हिरण्यकश्यप के क्रूर कर्मों को स्वीकारते हुए भी उनकी दुर्गति न होने की प्रार्थना की। इस पर प्रसन्न हुए नरसिंह देव ने उनके पिता ही नहीं बल्कि इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करने का वरदान दे दिया। यही प्रसंग प्रहलाद की भक्ति को अनंत और अद्वितीय बना देता है।
स्वामीजी ने महाराज बलि की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर भगवान वामनदेव को प्रसन्न किया, जिसके फलस्वरूप श्रीहरि प्रतिदिन उनके राजप्रासाद के द्वार पर दर्शन देने का संकल्प लेकर प्रकट होते रहे। कथा स्थल पर हरिओम शरण, कालिका सिंह, डॉ. धनंजय पांडेय, रविंद्र सिंह, दरबारी यादव, धीरेन्द्र सिंह, डॉ. अशोक तिवारी, डॉ. उमेश सिंह, महेशचंद्र मिश्र, डॉ. रामशब्द सिंह, आचार्य अभिषेक पांडेय, दुर्गविजय सिंह, राम विजय सिंह, विमल मिश्र, आशीष तिवारी, आयुष कुमार, विनीत पांडेय सहित बड़ी संख्या में भक्तगण उपस्थित रहे।

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