हिंदी, हिंदू व हिंदुस्तान के लिए समर्पित रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चाचा राजविजय सिंह : गनेश सिंह
करहां (मऊ) : मेरे चाचा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. राज विजय सिंह का जन्म 1909 में ग्राम देवरिया खुर्द, मऊ में हुआ था। अल्पायु में पिता के निधन और विवाह के बाद देशप्रेम की भावना से घर छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी पर जेल गए। गांधी-इरविन समझौते के बाद रिहा हुए।
हिंदी के प्रबल समर्थक चाचाजी ने महाराष्ट्र में शहर-शहर घूमकर हिंदी का प्रचार किया। यवतमाल के पुसद में हिंदी विद्यालय के प्रधानाध्यापक रहे, लेकिन गांधीजी के जेल भरो आंदोलन के समर्थन में पद त्यागकर आंदोलनकारियों को प्रेरित करने लगे। हिंदी के प्रचार के कारण वर्धा जेल में बंद रहे, जहां बाबू राजेंद्र प्रसाद और विनोबा भावे के संपर्क में आए। इंदौर में हिंदी विशारद की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर महात्मा गांधी ने स्वयं प्रमाणपत्र प्रदान किया।
गांव लौटने पर वे ‘सुराजी बाबू’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र प्रदान किया। 30 जुलाई 2001 को प्रयागराज में उनका निधन हुआ। पितृपक्ष में ऐसे राष्ट्रसेवी पूर्वज को सादर तर्पण एवं नमन।👏💐
-गनेश कुमार सिंह, देवरिया खुर्द, मऊ



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