अयोध्या का पूर्वी द्वार है तमसा तट का देवलास
तमसा तीर निवासु किय, प्रथम दिवस रघुनाथ।
करहाँ, मऊ : मुहम्मदाबाद गोहना विकास खंड का तमसा किनारे बसा हुआ पवित्र देवलास धाम प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या का पूर्वी द्वारा कहा जाता है। अर्थात यहां से कभी लोग अयोध्या राज्य में प्रवेश करते थे। बताया तो यहां तक जाता है कि यहीं रामवनगमन के प्रथम दिन भगवान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सहित रुके थे। प्रातः यहीं बाल सूर्य भगवान की आधारशिला रख पूजन किया और आगे प्रस्थान किया। रामचरित मानस में इसका उल्लेख है- "बालक वृद्ध बिहाइ गृह, लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय, प्रथम दिवस रघुनाथ।।" कालांतर में गुप्तकालीन शासक राजा विक्रमादित्य ने यहां बाल सूर्य भगवान का मंदिर स्थापित किया। यह सूर्य मंदिर भारत के सुप्रसिद्ध कोणार्क व लोलार्क सूर्य मंदिर की तरह बालार्क सूर्य मंदिर के रूप में विख्यात है। यह स्थान देवर्षि देवल की तपोभूमि एवं पवित्र कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है। जहां छठ पर्व पर एक एक सप्ताह का भव्य मेला भी लगता है। इसका उल्लेख आजमगढ़ के गजेटियर में पृष्ठ संख्या 156 पर उल्लखित है।
इस समय अयोध्या में नवनिर्मित प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव को लेकर भारी उत्साह है। आखिर हो भी क्यों न क्योंकि 500 वर्षों के लंबे संघर्ष एवं सैकडों कुर्बानी के बाद वर्तमान पीढ़ी को यह दिन देखने को मिल रहा है। दो हरियों अर्थात राम और परशुराम के मिलन का स्थल दोहरीघाट, रामवन व सीताकुंड के रूप में काझा की तरह बालार्क सूर्य मंदिर देवलास को भी अयोध्या और भगवान राम से जोड़कर देखा जाता है। यहां बाल सूर्य भगवान की छोटी सी किंतु मनोरम प्रतिमा स्थापित है।
ब्रहमा के पौत्र और दक्ष प्रजापति के पुत्र देवल ऋषि की यह तपोस्थली है। ऐसा माना जाता है कि त्रेता युग में वनवास गमन के दौरान प्रभु श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर देवर्षि देवल की तपोभूमि देवलास के पास एक रात विश्राम किया था। इस प्रकार प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनकर जब तैयार है, तब मऊ जनपदवासी भी अपने को अवध से जोड़कर देख रहे हैं और सौभाग्यशाली समझ रहे हैं तथा प्रभु श्रीराम के दर्शन को लालायित हैं।
बताया जा रहा है कि पहले यहीं से तमसा नदी बहती थी लेकिन समय बीतने के साथ इस समय लगभग चार किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में बह रही है। दूसरे मत के अनुसार भगवान श्रीराम वनगमन के दौरान नहीं बल्कि बक्सर ताड़का वध के लिए जाते समय गुरु विश्वामित्र के साथ यहां पर एक रात विश्राम किये थे। गुरु विश्वामित्र के द्वारा बताया गया कि पूर्वी दिशा में यह स्थान अयोध्या की सीमा का पूर्वी द्वार है तब भगवान राम ने यहां सूर्य भगवान के विग्रह की स्थापना की थी। जिसे बालार्क सूर्य मंदिर का नाम मिला। यहाँ विक्रमादित्य के शासन काल का पुराना चौखट आज भी मौजूद है।



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