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पति के दीर्घायु के लिए महिलाओं ने रखा करवा चौथ का व्रत

पति के दीर्घायु के लिए महिलाओं ने रखा करवा चौथ का व्रत

◆चलनी से किया पहले चंद्रदेव फिर पतिदेव का दर्शन

◆विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कर किया व्रत का पारण

करहां (मऊ) : सम्पूर्ण भारत राष्ट्र सहित विदेशों में रहने वाली हिंदुस्तानी महिलाओं ने बुधवार को पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। जनपद की तमाम सुहागिनों के साथ करहां परिक्षेत्र में भी इस व्रत की धूम रही।

बाजारों में दिनभर बनी रही विशेष चहल पहल के साथ देर शाम मुहम्मदाबाद गोहना विकास खंड के विभिन्न गांवों सहित राजर्षि नगर, दरौरा में भी सुहागिन महिलाओं ने सामूहिक रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा कर चंद्रदर्शन के साथ पति का चेहरा देखा और अर्घ्य देने के बाद स्वयं जल ग्रहण किया।

ज्ञातव्य हो कि इस व्रत को पहली बार माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से मां पार्वती को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिला था। कहते हैं कि तभी से सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद पाने के लिए करवा चौथ का व्रत रख रही हैं। ऐसा माना जाता है कि यह व्रत रखने से पति के जीवन में किसी भी तरह के कष्ट नहीं आते हैं।

इसी उद्देश्य के निमित्त जनपद भर में महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर पूजन अर्चन किया। मुख्य रूप से तारा शंकर भारद्वाज कर्मचारी कालोनी, सुमन संजय सिंह कनियारीपुर कोपागंज, माधुरी रणवीर सिंह रामपुर, श्वेता काशीनाथ मिश्र पलिया, किरन रविन्द्र सिंह दरौरा, श्वेता विवेक रंजन पलिया, मनीषा बबली आशीष सिंह सुल्तानीपुर, अर्चना अज़ीत सिंह राजर्षि नगर, अर्चना विनोद सिंह मंटू मुंशीपुरा, रोमी कुश सिंह राजर्षि नगर, निधि विपुल सिंह भदीड़, अंशू सुनील जायसवाल करहां, संगीता जयप्रकाश यादव सम्मोपुर, सरोज संतोष सिंह दरौरा, मानसी सिंह बरपुर मऊ, वंदना ज्ञानवेंद्र सिंह असोना, गीता देवी डॉक्टर एलबी चौहान गोपालपुर, रीना बजरंगी सिंह दरौरा, सिब्बी भूपेंद्र पांडेय सौसरवां, सुधा सोनू सिंह अवराईं, अर्चिता पवन सिंह राजर्षि नगर आदि सुहागिन स्त्रियों ने करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर व्रत का संकल्प लिया।

इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रख शाम को चंद्रमा के उदय होने पर तुलसी माता के समीप गौरी, गणेश, भगवान शिव-पार्वती, कार्तिकेय और चंद्रमा का पूजन किया।

चंद्रमा की पूजा कर सात बार गोल-गोल घूमकर अर्घ्य दिया। विधि-विधान से पूजन करने के बाद स्वयं ही वाचन कर करवाचौथ की कथा सुनी।

पूजा करने के बाद महिलाओं ने अपने पतियों का चेहरा देखा तथा निर्जला व्रत का पारण किया। इस मौके पर व्रती महिलाओं ने कहा कि करवा चौथ का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्त्व रखता है और यह उनके पतिव्रता, प्रेम और साझेदारी का प्रतीक होता है।

करवा चौथ की कथा..

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहां तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे।

एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जला व्रत है, और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूंकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो।

इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।

उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ-? करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।

इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह कर वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश-मां गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।



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