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शिक्षा के साथ संस्कार व्यक्तित्व निर्माण में आवश्यक : प्रधानाचार्य जेके मेमोरियल पब्लिक स्कूल, दरौरा, मनोज कुमार पांडेय


शिक्षा के साथ संस्कार व्यक्तित्व निर्माण में आवश्यक : प्रधानाचार्य जेके मेमोरियल पब्लिक स्कूल, दरौरा, मनोज कुमार पांडेय


करहां (मऊ) : किसी भी बालक के व्यक्तित्व में जिस प्रकार माता-पिता के आनुवांशिक गुणों के साथ वातावरण का भी गहरा प्रभाव पड़ता है, ठीक उसी प्रकार उसके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में शिक्षा के साथ संस्कार का भी होना अति आवश्यक है। यह दोनों एक दूसरे के समानांतर चलने वाली प्रक्रिया है जो एक दूसरे की पूरक भी हैं। हमारी वर्तमान संततियों में देश, समाज व परिवार के प्रति संस्कार भरने की नितांत आवश्यकता है। सही कहिये तो भारत में सनातन शिक्षा पद्धति के अनुसार संस्कारित शिक्षा व शैक्षिक संस्कार की अवधारणा वाली संस्कृति विकसित होनी चाहिये जिसमें संस्कारशाला की अवधारणा दैनिक जागरण की सराहनीय पहल है।

उक्त उद्गार मुहम्मदाबाद गोहना विकास खंड के दरौरा स्थित जेके मेमोरियल पब्लिक स्कूल के परिसर में प्रधानाचार्य मनोज कुमार पांडेय ने व्यक्त किये। वे छात्र-छात्राओं को दैनिक जागरण की अनूठी पहल संस्कारशाला का वाचन कर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि शिक्षा से ज्ञान, समझ और अनुभव मिलता है, जबकि संस्कार से व्यक्ति का व्यक्तित्व बनता है। शिक्षा के बिना संस्कार की कल्पना नहीं की जा सकती और संस्कारों के बिना अच्छी शिक्षा भी नहीं हो सकती। जहां शिक्षा से विद्यार्थियों में अनुशासन, आज्ञाकारिता और विनम्रता का विकास होता है, वहीं संस्कार, जीवन का सार है। संस्कारों से ही व्यक्ति की पहचान होती है। सबसे पहले संस्कार, माता-पिता से ही मिलते हैं। इसलिए अभिभावकों को अपने बच्चों के संस्कारों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। संस्कारों से ही व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि का पता चल जाता है।

बताया कि व्यक्तित्व के विकास में शिक्षा व संस्कार का होना जरूरी है। शिक्षक बच्चों को ज्ञान देने के साथ-साथ संस्कार भी सिखाता है। अच्छा शिक्षक वही है जो बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के साथ-साथ जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए सही मार्ग दर्शन भी करे। यद्यपि शिक्षा विकास की नींव है, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि केवल शिक्षा पर जोर देंगे तो यह दुनिया आगे चलकर पंगु बन जाएगी। रिश्तों में दिनों दिन आ रही टूटन, पति-पत्नी के बीच बढ़ते तलाक, भाई-भाई में तकरार, माता पिता की सेवा के प्रति उदासीनता, संस्कारों की कमी का ही परिणाम है। कहा कि घर के बाहर खड़ी कार हमारी समृद्धि की पहचान है, पर घर के अंदर के संस्कार हमारी कुलीनता की परिचायक है।

हमने बच्चों को कार नहीं दी तो वह दो दिन रोएंगे और संस्कार न दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे और हमें भी रुलाएंगे। कहा कि बच्चों को अच्छे मूल्य और अच्छे संस्कार दें ताकि हम उन पर सदा गौरव कर सकें। सुंदर मकान का निर्माण पत्थरों से होता है, सुंदर शहर का निर्माण पेड़ों से होता है, पर सुंदर मानव जाति का निर्माण नई पीढ़ी को संस्कारित करने से होगा। हमने बच्चों को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया तो बुढ़ापे में हमारे भाग्य का खराब होना तय है। बच्चों को उन विद्यालयों में पढ़ाएं जहां शिक्षा के साथ संस्कार भी दिए जाते हैं, नहीं तो वह पैसा कमाना तो सीख जाएगा, पर परिवार का पालन पोषण करना सीख नहीं पाएगा।

बच्चों को केवल जन्म देने वाले माता-पिता सामान्य दर्जे के होते हैं, संपति देने वाले मध्यम दर्जे के होते हैं, उन्हें गलत प्रवृत्तियों से जोड़ने वाले अधम दर्जे के होते हैं, पर बच्चों को शिक्षा, संपत्ति के साथ साथ ऊंचे संस्कार देने वाले माता-पिता उत्तम दर्जे के होते हैं। आज के जमाने में पुरानी पीढ़ी के पास अच्छे संस्कार है और नई पीढ़ी के पास अच्छी शिक्षा है। दोनों आपस में तालमेल बिठाकर चले तो आनंद से भरा हुआ परिवार का निर्माण होगा।

इस अवसर पर प्रबंधक इन्द्रदेव सिंह, हरिनारायण सिंह, कृपानारायण सिंह, अजय कुमार सिंह टुनटुन, संतोष चौहान, प्रियंका, विद्यार्थीगण रुद्र प्रताप सिंह, सुप्रिया सिंह, सौम्या सिंह, आदित्य सिंह, अभिनव कुमार, अंशिका यादव, आदर्श शर्मा, एकता सिंह, सैकत विश्वास, प्रगति सिंह, सारिका यादव, शुभम कुमार आदि सैकड़ों छात्र-छात्रायें व अध्यापकगण उपस्थित थे।

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