शबरी को प्रभु श्रीराम ने दिया था नवधा भक्ति का आशीर्वाद : सुधीरदास
करहां (मऊ) : मुहम्मदाबाद गोहना ब्लॉक के शमशाबाद में चल रही रुद्र महायज्ञ के तीसरे दिन नये मंदिर में स्थापना हेतु मंगाई गयी मूर्तियों का नगर भ्रमण कराया गया। सायंकाल कथा में किशुनदासपुर आजमगढ़ से पधारे हुए कथा वाचक सुधीरदास महाराज ने नवधा भक्ति की महिमा पर प्रकाश डाला। बताया कि सबसे पहले नवधा भक्ति भक्त प्रहलाद को प्राप्त हुई थी। बाद में प्रभु श्रीराम ने वनगमन के दौरान माता शबरी से मिलने पर उन्हें नवधा भक्ति का आशीर्वाद प्रदान किया।
कथा में नवधा भक्ति से जुड़े हुये प्रमुख लोंगो के बारे में बताया गया। उन्होंने कहा कि श्रवण राजा परीक्षित, कीर्तन शुकदेव, स्मरण प्रह्लाद, पादसेवन लक्ष्मी, अर्चन पृथुराजा, वंदन अक्रूर, दास्य हनुमान, सख्य अर्जुन और आत्मनिवेदन में राजा बलि का नाम लिया जाता है। श्रवण के अंतर्गत ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना है। कीर्तन में ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना है।
स्मरण में निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना होता है। पाद सेवन में ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्व समझना श्रेष्ठ माना जाता है। अर्चन मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना है। वंदन भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना है। दास्य में ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना है। सख्य ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना है। साथ ही आत्मनिवेदन के अंतर्गत अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यही सब भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।
इस दौरान रामकृष्ण दास, दिनेश सरोज, नारायण दास, घुरहू गुप्ता, पंडित कपिलदेव महाराज, रमेश सरोज, संतोष महाराज, कमलेश कुमार, गीता देवी, अजय सरोज, योगेन्द्रदास, आशा देवी, बालक दास, अमित सरोज, राहुल कुमार आदि सैकड़ों स्त्री-पुरुष मौजूद रहे।

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