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एक साथ श्रीकृष्ण व भगवती योगमाया का हुआ मंगल अवतार : गर्गाचार्य महाराज

एक साथ श्रीकृष्ण व भगवती योगमाया का हुआ मंगल अवतार : गर्गाचार्य महाराज

•श्रीलक्ष्मी नारायण मंदिर करहां के विष्णु महायज्ञ में चल रही भागवत कथा का चौथा दिन

•वेदीपूजन, हवन, परिक्रमा व आरतीमय रहा पूरा दिवस

करहां (मऊ) : स्थानीय करहां गांव स्थित क्षीरसागर लक्ष्मी नारायण मंदिर के परिसर में चल रही श्रीविष्णु महायज्ञ व श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक पंडित राकेश शुक्ल गर्गाचार्य महाराज ने भक्त प्रहलाद, समुद्र मंथन, बावन भगवान व श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनाई। उन्होने कहा कि एक साथ श्रीकृष्ण और भगवती योगमाया का मंगल अवतार हुआ जिनमें से भगवती योगमाया आकाशवाणी करके रथारमरुढ़ होकर विंध्यक्षेत्र के त्रिकोण पर्वत पर आकर विराजमान हुई।

इसके पहले करहां के पूर्व जिला पंचायत सदस्य आशीष चौधरी व ग्राम प्रधान प्रत्याशी राहुल मौर्य ने व्यासपीठ का पूजन और कथावाचक का माल्यार्पण कर कथा का शुभारंभ किया। यज्ञाचार्य लालमणि चौबे व सहयोगी वैदिक ब्राह्मण आचार्य विजय कुमार मिश्र, रविन्द्रनाथ उपाध्याय, अनूप तिवारी, शुभम मिश्र, नरेन्द्र दूबे द्वारा मुख्य यजमान सर्वेश तिवारी, अश्विनी पांडेय, संगीता पांडेय, अयोध्या गुप्ता, मीरा गुप्ता, सुनील गुप्ता, सोनम गुप्ता, राहुल गुप्ता, अर्चना गुप्ता, अनिल मद्धेशिया, रीना मद्धेशिया, विपिन सिंह, कपिल यादव, अरुण तिवारी चंद्रबाला देवी से पहले दूसरे व तीसरे चरण में वेदी पूजन, हवन व भागवत भगवान व व्यासपीठ की आरती संपन्न करवाया गया।

कथा विस्तार में गर्गाचार्य महाराज ने बताया कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी बुधवार की मध्यरात्रि में भगवती योगमाया के साथ  भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र का प्राकट्य हुआ। उस समय वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाइसवें द्वापर का आठ लाख तिरसठ हजार आठ सौ पचहत्तरवां वर्ष व्यतीत हो रहा था। जिस रात्रि को जिस क्षण वृष्णि वंश में श्रीकृष्ण जन्में ठीक उसी क्षण नन्दगोप कुल में भगवती योगमाया ने जन्म ग्रहण किया। बताया कि जन्माष्टमी व्रत महोत्सव केवल कृष्ण के साथ नही बल्कि योगमाया सहित श्रीकृष्ण योगमाया जन्माष्टमी व्रत महोत्सव का आयोजन तीर्थ देवालय गृह कुटुम्ब में प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा व उत्साह पूर्वक करना चाहिए।

कहा कि कंस कारागार माथुर मण्डल से महात्मा वसुदेव के मस्तक पर विराजमान शेषछत्रावेष्टित बालकृष्ण रातो-रात गोकुल में माता यशोदा के पर्यंक में विराजमान हो गये और यशोदाजी की कन्या श्रीयोगमाया जी क्रूरकर्मा कंस को ललकारती हुई मथुरापुरी के आकाश से देवराज इंद्र के रथ में बैठकर  अर्चित-पूजित होती हुई विन्ध्याचल पर्वत पर आकर विन्ध्यवासिनी नाम से प्रसिद्ध हो गई। वह अब अपना दर्शन-पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के समस्त संकट बाधाओं को चूर्ण-चूर्ण कर देती है। अपने उपासकों को धन-धान्य, शुभमति, पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न बना देती हैं।

कथा मंच का संचालन चंद्रकांत तिवारी व आभार प्रदर्शन रितिक सिंह ने किया, जबकि शुशील दूबे, बंटी पांडेय व दिलीप पांडेय आदि संगीत साधकों ने सुरमई गीतों से माहौल संगीतमय एवं भक्तिमय बनाया। इस अवसर नागेंद्र सिंह, शकुंतला देवी, सुनील कुमार, अखिलानंद द्विवेदी, गीता देवी, श्रीकांत चौरसिया, किशोरी देवी, मधुबाला देवी, बिजेंद्र सिंह, विधिचंद्र चौहान, अंजनी सिंह, राजेंद्र मौर्य, प्रमोद कुमार, पिंकी देवी, सर्वेश सिंह सहित सैकड़ों स्त्री-पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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