जिसकी रक्षा परमात्मा करे उसका बाल बांका नहीं हो सकता : स्वामी ज्ञानानंद
करहाँ (मऊ) : जिस समय हिरण्यकश्यपु मन्दराचल पर्वत पर अत्यंत भीषण तप कर रहा था, उसी समय देवराज इंद्र ने उसकी पत्नी कयाधु को मारना चाहा। नारदजी ने कहा देवराज इसको मत मारो इसके गर्भ में गोविन्द का परम लाडला भक्त पल रहा है। यह मारने योग्य नहीं है, यह तो वन्दनीय है। भक्त प्रहलाद को मारने का बहुत प्रयास हुआ लेकिन जिसकी रक्षा स्वयं चार भुजाओं वाला करे उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। गर्भ में कथा सुनने के फलस्वरूप राक्षस कुल में उत्पन्न होने पर भी प्रहलादजी भगवान के भक्त हुये और अपने पिता को भी मोक्ष दिलाया। श्रवणं कीर्तनं विष्णो स्मरणं पादसेवनं। अर्चनं बन्दनं दास्यं सख्यमात्म निवेदनं॥
उक्त बातें श्रीपीठ गोवर्धन, श्रीकृष्ण योगमाया शक्तिपीठ अष्टभुजा व श्रीमद आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य वैदिक शोध संस्थानम काशी के संस्थापक अध्यक्ष व भारत राष्ट्र के प्रख्यात संत स्वामी ज्ञानानंद सरस्वतीजी ने कहीं। वे जफरपुर स्थित श्रीमद्भागवत कथा व सह रुद्राम्बिका यज्ञ के तीसरे दिन की कथा में भक्तों को प्रहलाद चरित्र की कथा सुना रहे थे।
स्वामीजी ने कहा कि जब भक्त प्रहलाद ने अपने पिता के समक्ष नवधा भक्ति का वर्णन किया तो वह नाराज हो गया। कहा कि हमारे दैत्यरूपी चन्दन वन में तुम कटीले वृक्ष कहाँ से हो गये-? प्रहलाद को पर्वत से गिराया, हाथियों से कुचलवाया, पर जिसकी रक्षा चारभुजा वाला करता है; उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हिरणकश्यपु ने कहा दुष्ट.. बता तेरा भगवान कहाँ-कहाँ है-? प्रहलाद ने कहा पिताजी ईश्वर सत्ता सर्वत्र व्याप्त है। धरती, आकाश और पाताल का कोई भी कण खाली नहीं है। कहने लगा- "कस्मात स्तम्भे न दृश्यते।" कहा कि तो फिर इस स्तम्भ में क्यों नहीं दिखाई देता-? तलवार लेकर खम्भे में मारने लगा तो नृसिंह भगवान प्रकट हो गए ।
खम्भे से प्रकट होकर अपनी सर्वत्र व्याप्ति को सिद्ध कर दिया। हिरण्यकश्यपु को अपनी जंघा पर बिठाकर अपने तीक्ष्ण नखों से उसके हृदय को विदीर्ण कर दिया। प्रहलाद ने हाथ जोड़कर कहा प्रभो यद्यपि मेरे पिता आसुरी स्वभाव के थे, फिर भी पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपने पिता को अधोगति से बचाये। इसलिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि उनकी अधोगति न हो। भगवान ने कहा अरे पगले.. जिस घर में तेरे जैसा कुल को पवित्र करने वाला मेरा भक्त उत्पन्न हो जाता है, उसकी 21 पीढ़ी की तत्काल सदगति हो जाती है। उसके तो कीड़े-मकोड़े भी तर जाते हैं, तो फिर आपके पिता की अधोगति कैसे हो सकती है-?
इस यज्ञ के मुख्य यजमान ख्यातिप्राप्त होमियोपैथ चिकित्साधिकारी डॉक्टर रामशब्द सिंह, अग्रज पूर्व राजस्व निरीक्षक रामविजय सिंह, तारा देवी, उर्मिला सिंह से आचार्यगण पंडित धनंजय, गौरव, अभिषेक, महेश, शुभम, विमल मिश्र आदि ने वैदिक रीति से यज्ञ मंडप में पूजन-अर्चन व समिधा निवेदित करवाई। सायंकाल की कथा में मुख्य रुप से डॉक्टर अजय सिंह, आशीष तिवारी, विनीत पांडेय, चन्द्रभान सिंह, प्रियव्रत शुक्ल, देवधारी यादव, सत्यव्रत, पलटन यादव, सर्वेश्वर सिंह, रामबृक्ष यादव, आयुष मिश्र सहित सैकड़ों माताएं-बहनें मौजूद रहीं। सबने मिलकर समवेत स्वर में भागवत भगवान की आरती का गान किया एवं कथा प्रसाद ग्रहण कर पुण्य के भागी बने और श्रीस्वामीजी का आशीर्वाद भी ग्रहण किया।


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