अनुशासित जीवन सफलता की गारंटी : डॉ. आरपी तिवारी
करहां (मऊ) : किशोरवय उम्र में सबसे बड़ी समस्या बड़ों की बातों का बुरा लगना होता है। प्रायः इस उम्र में बच्चे माता-पिता व शिक्षक से दूरी बनाने लगते हैं। उनका स्वभाव विद्रोही हो जाता है तथा वे स्वछंद जीवन जीना चाहते हैं। इसी फिराक में वे कभी-कभी अनुशासनहीन हो जाते हैं। इस समस्या को माता-पिता व शिक्षकों को बड़ी-सूझबूझ से हल करना होता है। किशोरों के साथ इस उम्र में थोड़ा दोस्ताना होकर अनुशासन के महत्व को समझायें। उनके मन मष्तिष्क में यह बात बैठ जानी चाहिए कि अनुशासन में रहेंगे तभी जीवन में सफल हो सकेंगे। क्योंकि अनुशासित जीवन सफलता की गारंटी है।
उक्त बातें आरएएफ महिला पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर रामप्रवेश तिवारी ने छात्राओं को संस्कारशाला सुनाते हुये कहीं। वे किशोर मन की बात का विश्केशन कर रहे थे। उन्होंने आगे बताया कि किशोर को यह समझना होगा कि लोगों के अपने विचार भी परस्पर विरोधी हो सकते हैं, क्योंकि मनुष्य सामाजिक विरोधाभासों का हिस्सा होता है। इन वास्तविकताओं का सामना करने पर निराशा या भ्रम की भावनाओं से ग्रसित होने से अच्छा है कि सामाजिक मान्यताओं और विश्वास प्रणालियों में द्वंद जैसे विषय के बारे में चिंतन व चर्चा में शामिल हों। यदि आपके विचार, भावनाओं पर नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित हैं, तो इसे तर्कसंगत सोच कहा जाता है। तर्कसंगत सोच समस्याओं को हल करने और लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित है। यह काफी हद तक नियमित अभ्यास के माध्यम से विकसित होती है। तर्कसंगत सोच को सफलता की सीढ़ी माना जाता है, खासकर अगर इसे कम उम्र में शुरू किया जाए। तर्कसंगत सोच को इतना उच्च सम्मान दिया जाता है, क्योंकि यह विश्लेषणात्मक शक्ति को बढ़ाता है।
किशोरों को आभाषी दुनियां और वास्तविक दुनियां में अंतर को समझाने का कार्य करना होगा। यह न केवल बच्चों के समग्र विकास और चरित्र निर्माण में सहायता करता है, बल्कि समस्या समाधान के लिए भी आवश्यक है। तर्कसंगत सोच एक प्रक्रिया है जो तर्क के साथ सोचने की क्षमता को परिभाषित करता है। इन चीजों को आसानी से समझने और उन्हें बहुत तेजी से आत्मसात करने की जरूरत है। यह बदले में उनकी दिमागी शक्ति को बढ़ाता है और उन्हें अधिक तार्किक और उचित व्यक्ति बनने में मदद करता है। तर्कसंगत सोच किशोरों में विकसित होने से वह अतीत पर सोचने से ज्यादा भविष्य के लिए रणनीति बनाने पर ध्यान देते हैं। सुनी सुनाई बातों पर अपनी राय बनाने से पहले तथ्यों की जांच करते हैं।
◆डाक्टर रामप्रवेश तिवारी, प्राचार्य- आरएएफ महिला पीजी कालेज शमशाबाद, मऊ।


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