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संसार में रहकर भी संबंध परमात्मा से बनाये रखें : कथाव्यास

संसार में रहकर भी संबंध परमात्मा से बनाये रखें : कथाव्यास

करहाँ (मऊ) : मुहम्मदाबाद गोहना तहसील के तिवारीपुर नासिरपुर, भाँटीकला एवं क्षेत्रान्तर्गत सुहवल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथाव्यास ने जड़भरत की कथा सुनाई। कहा कि हमें भी जड़भरत और कीचड़ में कमल की भांति इसी संसार में रहकर खुराक लेनी है। जगत में रहते हुए भी अपना भाव समर्पण ईश्वर से बनाये रखें क्योंकि हमें उसी ने भेंजा है और पुनः उसी के पास जाना है। आखिर हम उसी परमसत्ता के ही तो अंशमात्र हैं।

कथा में बताया गया कि भरत बड़े तपस्वी थे एक दिन स्नान करते समय एक हिरणी को देखा जो गर्भवती थी। सिंह की दहाड़ से भयभीत होकर वह नदी में कूद गई और तैरते-तैरते थक गई। इस प्रकार उसने जल में ही बच्चे को जन्म दे दिया और मर गई। भरतजी को उस बच्चे पर दया लगी और उसको अपने आश्रम ले आए। बच्चे की सेवा में जो भजन करते थे वह भी छूट गयी। इस प्रकार उन्हें हिरण के बच्चे में आसक्ति हो गई। उसी की सेवा में लगे रहते थे।

"अन्ते या मति सा गति।" अर्थात अंत में जैसी मति होती है, वैसी ही गति होती है। अंत समय जब आया और प्राण निकलने लगे तो उन्हें उस हिरण के बच्चे की चिंता सताने लगी। मेरे बाद इसकी देखभाल कौन करेगा-? इस आसक्ति के कारण उन्हें मृग बनना पड़ा।

इस कथा से हमे यह शिक्षा मिलती है कि हम प्रेम सबसे करें, अपना कर्तव्य भी पूरा करें लेकिन उसमें लिप्त न हों। आसक्ति और समर्पण तो केवल और केवल परमात्मा में ही होना चाहिए। कथा में मुख्य रुप से ललित नारायण गिरी, विजयबहादुर तिवारी, धनंजय पांडेय, विमल मिश्र, चन्द्रकान्त तिवारी, शुभम आचार्य, रामअवतार सिंह, गौरव मिश्र, मनोज सिंह, डाक्टर अशोक तिवारी, कुलदीप, संतोष सिंह, तेजप्रताप तिवारी, उदयवीर सिंह, अज़ीत चौबे, रितिक सिंह, अमित कुमार आदि सैकड़ों स्त्री-पुरुष मौजूद रहे।

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