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श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुन भावविभोर हुये श्रोता

श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुन भावविभोर हुये श्रोता

करहाँ (मऊ) : मुहम्मदाबाद गोहना तहसील के तिवारीपुर, भाँटीकला तथा क्षेत्रान्तर्गत सुहवल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनाई गई। कथाव्यास भागवत रसिक डॉक्टर धनंजय पांडेय, पंडित ललित नारायण गिरी व महेशचंद्र मिश्र ने उपस्थित श्रोताओं को देवकी-वसुदेव के आठवें गर्भ का रहस्य समझाया। बताया कि किस प्रकार भगवती योगमाया व श्रीकृष्ण चंद्र का प्राकट्य हुआ और कंस को चेताने वाली आकाशवाणी की गई।

कथितो वंश विस्तारो भविता सोमसूर्ययोः। राज्ञां चोभयवश्यानां चरितं परमादभुतम।। कथा में कथाप्रवक्ताओं बताया कि चन्द्रवंशी राजा महाराज शूरसेन के पुत्र वसुदेव थे। उनका विवाह कंस की चचेरी बहिन देवकी से हुआ था। कंस बड़ी प्रसन्नता से अपनी बहन देवकी को विदा कर रहा था कि ठीक उसी समय आकाशवाणी हुई कि इसका आठवां गर्भ तेरा काल होगा।  कंस ने यह आकाशवाणी सुनकर अपनी बहन को ही मारने के लिए तलवार निकाल लिया। वसुदेवजी ने समझाया कि राजन मृत्यु तो निश्चित है, चाहे आज हो है चाहे सौ साल बाद हो। अपनी बहन को मार कर महाराज भोज के यशस्वी वंश को कलंकित मत करो।

वसुदेव कहते हैं कि पति का कर्तव्य है कि वह हमेशा अपनी पत्नी की आन, बान, शान और प्राणों की रक्षा करे। इस परिस्थिति में उन्होंने कंस को वचन दे दिया कि आपको देवकी की संतान से भय है, देवकी से तो नहीं। इसलिए हम सारी संताने आपको दे देंगे। इस प्रकार उन्होंने कंस के कथनानुसार उसके कारागार में रहना स्वीकार कर लिया। क्रमशः देवकी के छह पुत्रो को दुष्ट कंस ने मार दिया। सातवें बलरामजी का संकर्षण करके रोहणी के गर्भ में डाल दिया गया। आठवें गर्भ के रूप में पूर्ण ब्रह्म परमात्मा और भगवती योगमाया पधारे। देवताओ ने भगवान की गर्भ स्तुति की और भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष अष्टमी को मध्यरात्रि में रोहणी नक्षत्र में कन्हैया का प्राकट्य हो गया।

इस अवसर पर गौरव मिश्र, विजयबहादुर तिवारी, जगदंबा दूबे, मनोज सिंह, विमल मिश्र, रामअवतार सिंह, शुभम तिवारी, डॉक्टर अशोक तिवारी, पंडित कुलदीप, उदयवीर सिंह, चन्द्रकान्त तिवारी, संतोष सिंह सहित सैकड़ों स्त्री-पुरुष श्रद्धालु श्रोतागण मौजूद रहे। अंत मे सबने मिलकर समवेत स्वर में आरती की तथा कथाप्रसाद ग्रहण किया।



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