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धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामाजिक एकता का केंद्र है देवलास

धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामाजिक एकता का केंद्र है देवलास

करहां (मऊ) : जिले का एक जाना-माना और प्रतिष्ठित केंद्र के रुप मे देवकली देवलास एक प्रसिद्ध स्थान है। मुहम्मदाबाद गोहना ब्लॉक व घोसी रोड पर स्थित देवकली देवलास एक अद्भुत धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामाजिक श्रद्धा, विश्वास व एकता का केंद्र है। यहां बाल सूर्य भगवान का बालार्क सूर्य मंदिर व ताल कुंड स्थित है। इसके अलावा सनातन आस्था से जुड़े हुए विभिन्न समाजों के दर्जन भर मंदिर यहां स्थापित हैं। यहां लोलार्क छठ पर आस्था का जनसैलाब उमड़ता है और एक सप्ताह का भव्य मेला लगता है। विभिन्न समाजों के कार्यक्रमों के अलावा यहां अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन भी होता है।

देवकली देवलास को अयोध्या राज्य का कहा जाता है पूर्वी द्वार

यूं तो भारत भर में अनेक नगरों व स्थानों के नाम प्रभु श्रीराम और माता जानकी की कथाओं से जुड़ी अलग-अलग घटनाओं व तथ्यों से विख्यात हैं, लेकिन उत्तर तरफ कल-कल करती मां सरयू की धारा और दक्षिण तरफ जीवनदायिनी तमसा नदी के बीच स्थित मऊ जिले के मुहम्मदाबाद गोहना विकासखंड के देवलास गांव को अयोध्या राज्य का पूर्वी द्वार कहलाने का गौरव प्राप्त है। किवदंतियां और जन श्रुतियां तो देवलास को अयोध्या राज्य का पूर्वी द्वार होने का प्रमाण देती ही हैं। आजमगढ़ गजेटियर के पृष्ठ संख्या 156 पर भी तत्कालीन विद्वानों ने इसका उल्लेख कर जनश्रुतियों पर के अपनी मुहर लगाया है।

ताड़का वध को जाते समय यहां रुके थे प्रभु श्रीराम

मान्यता है कि बक्सर ताड़का वध को गुरु वशिष्ठ के साथ जाते समय प्रभु श्रीराम ने देवलास में ही रात्रि विश्राम किया था। कथा यह भी है कि रामवनगमन के प्रथम दिन भगवान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सहित रुके थे। श्रुतियों के अनुसार गुरु विश्वामित्र ने ही प्रभु श्रीराम को बताया कि पूर्वी दिशा में यह स्थान अर्थात देवलास अयोध्या की सीमा का पूर्वी द्वार है। इसे जानने के बाद मान्यता है कि भगवान राम ने इस स्थान पर सूर्य भगवान के विग्रह अर्थात मंदिर व मूर्ति की स्थापना की। कई जीर्णोद्धार के बाद मंदिर देवलास में अब भी मौजूद है, जिसे बालार्क सूर्य मंदिर के नाम से जाना जाता है। वनागमन के समय लक्ष्मण व माता सीता के साथ आए प्रभु श्रीराम ने ही बाल सूर्य भगवान की आधारशिला रख पूजन किया व आगे प्रस्थान किया। रामचरित मानस में इसका उल्लेख "बालक वृद्ध बिहार गृह, लगे लोग सब साथ' चौपाई के माध्यम ये किया गया है। 'तमसा तीर निवास किय, प्रथम दिवस रघुनाथ।: 

देवर्षि देवल ऋषि की तपस्या स्थली है देवलास

देवलास को ब्रहमा के पौत्र और दक्ष प्रजापति के पुत्र देवल ऋषि की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि त्रेता युग में वनवास गमन के दौरान प्रभु श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर देवर्षि देवल की तपोभूमि देवलास के पास एक रात विश्राम किया था। बताया जाता रहा है कि पहले तमसा नदी यहीं से होकर बहती थी, लेकिन समय बीतने के साथ इस समय लगभग चार किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में बह रही है।

बाल सूर्य भगवान 'बालार्क' का है प्राचीन मंदिर

यहां सबसे पुराना मंदिर बालार्क नामक बाल सूर्य भगवान का मंदिर है। कोणार्क, लोलार्क के समकालीन व समकक्ष इस मंदिर की भी बहुत मान्यता है। जैसे कोणार्क व लोलार्क में कुंड हैं और वहां स्नान पर्व लगता है, ठीक उसी प्रकार यहां भी पवित्र कुंड स्थित हैं जहां प्रतिदिन व दिन विशेष लोलार्क छठ पर भव्य स्नान पर्व लगता है।

प्राचीन चौकठ ऐतिहासिकता का है प्रमाण

यहां सूर्य मंदिर के पीछे हनुमानगढ़ी के अहाते में एक प्राचीन, ऐतिहासिक व विशाल काला चौकठ विद्यमान है। इसका संबंध राजा विक्रमादित्य से माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान राम के बाद राजा विक्रमादित्य ने ही इस स्थान का जीर्णोद्धार कराया था। उनके समय ही वर्तमान सूर्य मंदिर का यह ढांचा, सामने का रहस्यमयी कुंआ व चौकठ विद्यमान है, जो यहां की ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता प्रमाण है।

विभिन्न समाजों के दर्जन भर स्थित हैं मंदिर

यहां सूर्य मंदिर के अलावा विभिन्न समाजों के शिव-शंकर, दुर्गा, विष्णु, राम-जानकी, हनुमान, राधा-कृष्ण, रामदरबार व महाराणा प्रताप, विश्वकर्मा रविदास, संत गणिनाथ, सुघर दास बाबा आदि के मंदिर स्थित हैं। सभी लोग अपनी आस्था व विश्वास के अनुसार पूजन-अर्चन करते हैं। यह स्थान एक अनोखी एकता व प्रेम सद्भाव का केंद्र है।

लोलार्क छठ पर एक सप्ताह का लगता है भव्य मेला

यहां प्रति वर्ष छठ पर्व के मौके पर एक सप्ताह के दिन-रात का परंपरागत व भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यहां दूरदराज से श्रद्धालु आते हैं और देवताल में पुण्य की डुबकी लगाते हैं। सूर्य मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों में मत्था टेकने के पश्चात मेले में जरुरत का सामान खरीदते हैं और मनोरंजन के साधनो का आनंद लेते हैं।

घुड़सवारी, दंगल, बिरहा, लोकनृत्य, गीत-संगीत के होते हैं विविध आयोजन

यहां मेले में विविध सांस्कृतिक व गीत संगीत के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वर्ष में एक बार भव्य घुड़सवारी की प्रतियोगिता आयोजित होती है, जिसमें कई जिलों व प्रदेश के नामचीन घोड़े व उनके सवार भाग लेते हैं। इसके अलावा समय-समय पर लोक संगीत, कवि सम्मेलन, सभा, रैली, प्रतियोगिता, जागरुकता कार्यक्रम, दौड़, बिरहा आदि के कार्यक्रम संपन्न होते हैं। इससे यहां की सांस्कृतिक विरासत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

विभिन्न समाजों की बैठकों एवं कार्यक्रमों का है केंद्र

यह स्थान अनेक तरह की बैठकों, सभा, पंचायतों, मांगलिक उत्सवों व जागरुकता कार्यक्रमो का भी केंद्र स्थल है। अनेक तरह के राजनीतिक अभियानों की शुरुआत भी यहां से की जाती है। लोग मानते हैं कि सुबह-सुबह सूर्य मंदिर से आशीर्वाद लेकर शुरु किया गया कार्य जरुर सफल होगा।

शिक्षा का भी अलख जगाता है देवलास

यहां दो प्रसिद्ध इंटर कालेज पुराने समय से शिक्षा के प्रमुख केंद्र है। देवर्षि देवल इंटर कालेज की गिनती जिले के जाने-माने शिक्षा केंद्रों में शुमार किया जाता है। इसके अलावा वर्तमान समय मे लगभग आधा दर्जन छोटे बड़े विद्यालय भी आसपास खुल गए हैं।

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