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गीता जयंती महोत्सव एवं श्रीमद्भागवत कथा हेतु पहुंचे स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती

गीता जयंती महोत्सव एवं श्रीमद्भागवत कथा हेतु पहुंचे स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती

~श्रीमद आद्यजगद्गुरु शंकराचार्य वैदिक शोध संस्थान काशी के हैं संस्थापक अध्यक्ष

~धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र संग्राम का अमृत फल है श्रीमद्भगवद्गीता : स्वामी ज्ञानानंद 

करहां, मऊ। आम्रपाली वैदिक शोध संस्थान बकवल में गीता जयंती महोत्सव पर सोमवार को सप्ताहपर्यंत शुरु हो रही भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ कथा हेतु भारत के प्रख्यात शांकर सन्यासी का आगमन हो चुका है। परमहंस परिव्राजकाचार्य स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज श्रीमद आद्यजगदगुरु शंकराचार्य वैदिक शोध संस्थानम काशी, श्रीपीठ गोवर्धन, श्रीकृष्ण योगमाया शक्तिपीठ अष्टभुजा के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे यहां सोमवार से रविवार तक भागवत कथा करेंगे जिसकी कलश यात्रा सोमवार सुबह निकलेगी।

गीता जयंती महोत्सव मार्गशीर्ष एकादशी की पूर्व संध्या पर उन्होंने भक्तों को संबोधित करते हुए बताया कि श्रीमद्भगवद्गीता धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र संग्राम का अमृत फल है। उन्होंने बताया कि यह एक जीवन उपयोगी ग्रंथ है जिसकी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से मार्गशीर्ष मोक्षदा एकादशी को सुनाई गई। गीता जयंती के इस पावन पर्व की उन्हीने सभी को शुभकामनाएं एवं मंगल आशीष प्रदान किया।

कहा कि कुरुक्षेत्र संग्राम का महारथी योद्धा जब गाण्डीवधारी अर्जुन की तरह अपनी काया, देह इंद्रिय रुपी घोड़े के रथ को सर्वतो भावेन श्रीकृष्णार्पित कर देता है, तो कृपालु कृष्ण उस पुण्य आत्मा के मेधा शक्ति का सार्थित्व स्वयं करने लगते हैं, परिणामतः तब उस पुण्यशील प्राणी को प्रति पल प्रकृति, जीव-जगत के सर्व कालिक भुक्ति-मुक्ति संग्राम के बीच विश्व ब्रह्माण्ड का सर्वाधिष्ठान् ईश्वर सत्ता के अविनाशी बोधामृत का आध्यात्म आलोक स्वमेव सर्वत्र उद्भाषित हो उठता है। फिर व्यामोह रहित खुली आंखों से, खुले कानों से, प्राणेश्वर के परम प्रिय देव-दुर्लभ दर्शन और साक्षात् श्रीमुख श्रवण का परम दुर्लभ सौभाग्य जागृत हो जाता है। सनातन वैदिक धर्म के सनातन परमात्मा का सनातनी नाद वायु-व्योम में सतत् ध्वनित हो रहा है।

आगे स्वामीजी ने श्रद्धालुओं को बताया कि तुझे जिस दुर्लभ स्वरुप, दर्शन, साक्षात्कार और अविनाशी योग श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हुआ है देवता भी इसके लिए तरसते हैं। देवों के रोम-रोम मेरे इस देव दुर्लभ दर्शन की नित्य आकांक्षा करते रहते हैं। सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शन काङ्क्षिण:।। मुझ सनातन परमात्मा का परम धर्ममय सनातन संवाद स्वरुप श्रीमद्भगवद्गीता शास्त्र में वर्णित अविनाशी योग, दर्शन, श्रवण का जो आदर बुद्धि से आलस्य रहित होकर अनेकानेक उपकरण माध्यमो से मनुष्य लोक में विस्तार करेगा अर्थात प्रचार-प्रसार करेगा, उसके द्वारा मै स्वयं परमात्मा ज्ञानयज्ञ से पूजित होता रहूंगा।

सम्पूर्ण पृथ्वी में उस मनुष्य से बढ़कर मेरा प्रियकार्य करने वाला अन्य कोई दूसरा कभी भी नहीं होगा। न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रिय कृत्तम:। भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।। इस अवसर पर आचार्य अभिषेक, गौरव मिश्र, मुख्य आयोजक उर्मिला सिंह, डॉक्टर आर. एस सिंह, आयुष कुमार, विनीत पांडेय, जिंतेंद्र तिवारी, रमेश राय, बालेन्द्र भूषण प्रताप सिंह, आशीष तिवारी सहित दर्जनों स्त्री-पुरुष श्रद्धालुगण मौजूद रहे।

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