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युवाओं में बढ़ रहा परंपरागत गुल्ली-डंडा खेल का प्रचलन

युवाओं में बढ़ रहा परंपरागत गुल्ली-डंडा खेल का प्रचलन

करहां (मऊ) : कहा जाता है कि कुछ चीजों में चक्रीय परिवर्तन होता है। इसमें फैसन आदि की तरह भारत का एक परंपरागत खेल गुल्ली-डंडा भी है। आधुनिक खेलों के आगे अपना स्तीत्व खो चुके इस खेल में अचानक बदलाव आया। इस समय पूरे जनपद के विभिन्न हिस्सों में तेज गति से युवा इस खेल की तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं और इसके टूर्नामेंट भी आयोजित हो रहे हैं।

गुल्ली डंडा पूरे भारत में काफी प्रसिद्ध खेल है। इसे सामान्यतः एक बेलनाकार लकड़ी से खेला जाता है जिसकी लंबाई बेसबॉल या क्रिकेट के बल्ले के बराबर होती है। इसी की तरह की छोटी बेलनाकार लकड़ी को गिल्ली कहते हैं जो किनारों से थोड़ी नुकीली या घिसी हुई होती है।

दरअसल गुल्ली-डंडा खेल एक बड़ी और एक छोटी नुकीली लकड़ी से खेला जाने वाला देशी खेल है। यह दो प्रकार से खेला जाता है। पहला गड्ढा खोदकर और दूसरा गोला बनाकर। खेल का उद्देश्य डंडे से गुल्ली को मारना होता है। गुल्ली को ज़मीन पर रखकर डंडे से किनारों पर मारते हैं जिससे गिल्ली हवा में उछलती है। गिल्ली को हवा में ही ज़मीन पर गिरने से पहले फिर डंडे से मारते हैं। जो खिलाड़ी सबसे ज्यादा दूर तक गिल्ली को मारता है वह विजयी होता है। क्षेत्ररक्षण टीम गुल्ली जमीन पर गिरने से पहले ही उसे लपकने का प्रयास करती है।

इस समय यत्र-तत्र हर तरफ खाली पड़े मैदानों में युवाओं और किशोरों का झुंड गुल्ली-डंडा खेलता हुआ नजर आ जायेगा। पिछले महीनों करहां के गुडमार्निंग पब्लिक स्कूल के विशाल मैदान में इसका बड़ा टूर्नामेंट भी आयोजित हो चुका है। इसमें पहुंची घोसी, कोपागंज, मधुबन, जहानागंज, मुहम्मदाबाद गोहना, पलिया, चिरैयाकोट सहित 28 टीमों को हराकर माहपुर की टीम विजेता बनी थी। करहां के समाजसेवी व जिला पंचायत के प्रय्याशी विक्की वर्मा ने उद्घाटन और समापन कर खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया था।

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