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ब्रह्म के प्रति जीव के समर्पण की कथा है महारास : आचार्य अनुज

ब्रह्म के प्रति जीव के समर्पण की कथा है महारास : आचार्य अनुज

करहां (मऊ) : मुहम्मदाबाद गोहना ब्लॉक अंतर्गत लग्गूपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन, छप्पन भोग, कंस वध, महारास, कुब्जा उद्धार व श्रीकृष्ण-रुक्मणि विवाह की कथा सुनाई गई। कथावाचक आचार्य अनुज कुमार मिश्र ने कहा कि महारास की कथा ब्रह्म के प्रति जीव के समर्पण की कथा है। इसका रहस्य समझना हल्के लोंगो की बस की बात नहीं। महारास आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा व परमात्मा का मिलन भाव अर्थात ब्रह्मार्पण है। साथ ही सोमवार के दिन हवन-पूर्णाहुति, प्रसाद तथा भंडारे के साथ कथा का विश्राम हो गया।

कथा विस्तार के क्रम में बताया गया कि गोपियां कोई साधारण स्त्री नही हैं। "गोभिः इन्द्रियैः कृष्ण रसं पिवति सा गोपी।" अर्थात जो प्रत्येक इन्द्रिय से कृष्ण रस का निरन्तर पान करे, वह गोपी है। महारास के उपरान्त भगवान मथुरा गये और कंस का वध किया। सत्रह बार जरासंध को पराजित किया। साथ ही रातों रात द्वारिका पुरी का निर्माण किया। रुक्मिणी से भगवान के विवाह के बारे में उन्होंने बताया कि विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री का नाम है रुक्मणी था। वह कन्हैया से बहुत प्रेम करती थीं। बताया कि रुक्मणी साक्षात लक्ष्मी का अवतार हैं। "रामरूपे भवेत सीता रुक्मिणी कृष्ण जन्मनि।" अर्थात रामावतार में लक्ष्मी, सीता बनकर आयीं और कृष्णावतार में रुक्मणी।

रुक्मिणी के भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया था। रुक्मणी ने द्वारिकाधीश को पत्र लिखा कि हे प्रभु मैंने जब से नारदजी के द्वारा आपके गुणों को सुना है मेरे सारे संताप नष्ट हो गए। अब आपकी यह दासी आपके दर्शन की अभिलाषी है। जैसे कोई सियार सिंह का भाग ले जाना चाहता है, उसी प्रकार मेरा विवाह शिशुपाल से हो रहा है। आप मुझे यहां से ले जाइये। पत्र सुनकर कन्हैया गये और कुलदेवी के मन्दिर से रुक्मिणी का हरण कर लिया और द्वारिकापुरी में धूमधाम से श्रीकृष्ण रुक्मिणी का परिणय सम्पन्न हुआ।

इस मौके पर यज्ञ के मुख्य आचार्य पंडित विवेक कुमार पांडेय, मुख्य यजमान तारा देवी व धर्मेंद्र प्रताप, रमेश, दिनेश, भोला, राजन, विपिन, पिंटू, राजबीर, महेश, सूर्यभान एवं अन्य कई स्त्री पुरुष मौजूद रहे।

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