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संघर्ष से स्वतंत्रता का सूरज उगाने वाले शमीम करहानी को भूल रहा जनपद

संघर्ष से स्वतंत्रता का सूरज उगाने वाले शमीम करहानी को भूल रहा जनपद


◆भूली-बिसरी स्मृतियों में याद किए जा रहे 'शमीम करहानी'
◆"संघर्ष से स्वतंत्रता का सूरज उगेगा" और "जगाओ न बापू को नींद आ रही है" नामक रचनाओं से पाई प्रसिद्धि

करहां (मऊ) : स्वतंत्रता आंदोलन के समय अपनी कलम से देशभक्ति की भावना भरने वाले जनपद निवासी तथा देश भर में प्रख्यात हुए शायर व लेखक को जनपद बिसराता जा रहा है। नई पीढ़ी तो मानो उनके योगदान से अपरिचित ही है। सुधिजन की भूली-बिसरी यादों में भी शमीम करहानी का योगदान गाहे-बगाहे ही चर्चा का विषय बनता है। स्वतंत्रता दिवस पर मरहूम शमीम करहानी को याद किए बिना जनपद के स्वतंत्रता आंदोलन के महानायकों को नमन करना अधूरा होगा।

स्वतंत्रता आंदोलन को जनभावना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले शमीम करहानी का जन्म तत्कालीन आजमगढ़ (अब मऊ) जिले के करहां गांव में 8 जून 1913 को और उनका निधन 19 मार्च 1975 को नई दिल्ली में हुआ। वे 20वीं सदी के प्रतिष्ठित उर्दू शायर थे, जिनकी कविता और शायरियां सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत  थीं। उनका असली नाम सैयद शम्सुद्दीन हैदर था, लेकिन उन्होंने 'शमीम करहानी' को अपना ‘तख़ल्लुस’ अर्थात उपनाम बनाया। जैसा कि उर्दू शायरी में परंपरागत रुप से होता है। यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि वे कभी-कभी अपने असल नाम को याद करने में चौंक जाया करते थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद आज़मगढ़ और दिल्ली में शिक्षक के रुप में काम किया।

स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी नज़्म गीत जैसे 'रौशन अँधेरा' अंग्रेजों भारत छोड़ो पर आधारित था। उनकी 'ताराने', 'अंधकार में भी आशा की किरण है' और 'संघर्ष से स्वतंत्रता का सूरज उगेगा' नामक रचनाएं भी बेहद लोकप्रिय हुई; जो देश की प्रभात फ़ेरियों में गाई जाती थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी की शहादत पर लिखी कालजयी नज़्म 'जगाओ न बापू को नींद आ गई है' बेहद प्रभावशाली रही। इस रचना से उन्हें देशवासी आज भी याद करते हैं।

बता दें कि शमीम करहानी को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरुजी का स्नेह और प्रोत्साहन अक्सर मिलता रहता था। उन्होंने उनसे स्वतंत्रता संग्राम पर एक महाकाव्य रचना लिखने के लिए निवेदन किया था। उनके प्रमुख काव्य संग्रहों और रचनाओं में बुर्क़-ओ-बारां, रौशन अंधेरा, ताराने, बढ़ चल रे हिंदुस्तान, तामीर, अक्स-ए-गुल, इंतिख़ाब-ए-क़लाम-शमीम, ज़ुल्फ़-ए-फर्क़, हर्फ़-ए-नीम-शब, जान-ए-बरादर, सुबह-ए-फारान, मैन बूटरबी, पुष्प-छाया आदि हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार से अक्स-ए-गुल के लिए, उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश से हर्फ़-ए-नीम-शब के लिए और भारत सरकार से रंग-के-गीत के लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ।
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शमीम करहानी की कहानी लोंगो की जुबानी👇

•मरहूम शमीम करहानी साहब हमारे गांव व परिवार की मिट्टी में जन्मे देश की अनमोल धरोहर थे। उनके जोशीले गीतों से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने वालों को प्रेरणा मिलती थी।

◆डाक्टर सैयद कल्बे अब्बास, चिकित्सक, करहां

•जनपद में करहां जैसी छोटी जगह पूरे जनपद में कौमी एकता की मिशाल है। इसमें सबसे बड़ा योगदान घनश्याम दास बाबा और देश भर में शायरी के कोहिनूर शमीम करहानी का है।

◆चंद्रशेखर मौर्य, शिक्षक, करहां

•बाबा घनश्याम साहब, फ़क़ीर मीर शम्शी और जनाब शमीम करहानी से ही करहां की पहचान है। उनकी नज़्मों में देश की एकता, साहस और बलिदान का आह्वान था।

◆आफताब अहमद उर्फ गुड्डू, समाजसेवी, करहां

•राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कविता जगत में हमारे जनपद की पहचान पंडित श्यामनारायण पांडेय और मरहूम शमीम करहानी से है। स्वतंत्रता दिवस पर दोनों की पुण्य स्मृतियों को नमन करता हूं।

◆देवकांत पांडेय, राष्ट्रीय कवि, देवकली देवलास

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