शमशाबाद कुटी को ग्रामीण पर्यटक स्थल घोषित किए जाने की उठी मांग
•300 वर्षो पुरानी कुटी में 11 दिव्य संतों की हैं समाधियां
•आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है मौनी बाबा की तपस्या वाली सुरंग
•स्वयंभू शिव मंदिर व राजा समशुद्दीन के किले के रुप में है ऐतिहासिक
करहां (मऊ) : करहां परिक्षेत्र अंतर्गत शमशाबाद गांव के पूर्वी छोर पर 300 वर्षो पुराना एक सिद्ध स्थल शमशाबाद कुटी के नाम से विख्यात है। जिसकी दिव्यता, पवित्रता, सिद्धता और शांतित्व अपने आप में अद्वितीय है। शमशाबाद कुटी, जो सिद्ध संत बाबा बीरमाधव साहब की कुटिया के नाम से जानी जाती है, जहां कुल 11 सिद्ध संतो की दिव्य समाधियां स्थित हैं। यहां का पवित्र सरोवर बीरमाधव दासजी के स्वयं के हाथों से खोदकर बनाया गया है। इस स्थान को ग्रामीण पर्यटक स्थल बनाए जाने की मांग ग्रामीणों ने उठाई है। इस बाबत पहले भी लिखित आवेदन जिले के मुख्य विकास अधिकारी को दिया जा चुका है।
बता दें कि यह एक ऐसा स्थल है, जहां सैकड़ों वर्षों से सिर्फ सिद्ध और भजनानंदी महात्मा ही रह पाते हैं। यहां आडंबर युक्त लोग रह ही नहीं पाते। बहुत सारे कलयुगी साधु आये लेकिन यहां पर रात गुजारना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। अब उस तरह के साधु के अभाव में वह कुटिया सूनी पड़ी है, परंतु यहां पर स्थित पूर्व के घनघोर जंगल में से जो दिव्य आम जनमानस से निकले साधु-जन रहे हैं उनकी सिद्धता और दिव्यता की चर्चा आज भी लोगों से सुनी जा सकती है।
यहां पर माता कदमा दास, माता बच्ची दास, बाबा वीर माधव दास एवं शुभकरन दासजी महाराज उर्फ मौनी बाबा की सिद्धता वाला क्षेत्र है। यहां पर लोगों द्वारा इन संतों का विशेष रूप से बहुत आदर भाव एवं प्रभाव माना जाता है। इसके अतिरिक्त वनवासी साधु नेउरदास, चरणदास, करनदास, राम चरण दास, धूपा दास, राजमन दास आदि साधु जनों की भी यहां दिव्य समाधियां स्थित हैं। इन सभी संतो में बाबा बीर माधव दास एवं संत शुभकरन दास मौनी बाबा की तपश्चर्या एवं ख्याति सबसे अधिक है। मौनी बाबा एक ऐसे सिद्ध और तपस्वी संत रहे हैं, जो प्रायः एक सुरंगरूपी गुफा में तपस्या करते थे। वह ज्यादा लोगों से मिलते जुलते नहीं थे। संत बीर माधव दास ने तो अपने समय में क्षेत्र के सुप्रसिद्ध मठ गुरादरी धाम का महंत पद भी अस्वीकार कर दिया था, ताकि उनकी तपस्या में बाधा न आ सके। वह भी लोगों से बहुत कम मिलते थे। खासकर स्त्रियों को सीधी आंखों से देखते तक नहीं थे।
इसका प्रमुख उद्देश्य इस विलुप्त होते हुए दिव्य स्थल की जानकारी नई पीढ़ी में अक्षुण रखना है, ताकि आज की पीढ़ी इस दिव्य स्थल की अनोखी जानकारी से परिचित हो सके। हालांकि वर्तमान समय में जंगल कम होने से अगल-बगल से अतिक्रमण की शिकायतों से श्रद्धालुजन आहत हैं। यहां पर आज भी वर्ष में एकबार भव्य मेला एवं विशाल कबड्डी प्रतियोगिता का आयोजन धूमधाम से होता है। छठ पर्व पर यहां के सरोवर में क्षेत्रीय नागरिक पूजन-अर्चन भी करते हैं।
शमशाबाद गांव प्राचीन कुटी, राजा समशुद्दीन के किले एवं स्वयंभू शिव मंदिर के नाम से भी विख्यात है। इससे इसकी ऐतिहासिकता झलकती है। जब पिछले महीनों बालार्क सूर्य मंदिर के कारण देवलास, रामजानकी व शिव मंदिर के कारण बरहदपुर तथा गुरादरी मठ के कारण चकजाफ़री गांव को ग्रामीण पर्यटक स्थल हेतु प्रशासन से प्रस्ताव भेंजा गया तो यहां के ग्रामीणों ने भी शमशाबाद को ग्रामीण पर्यटक स्थल के प्रस्ताव में शामिल करने की मांग उठाई। करहां सदस्य जिला पंचायत के प्रतिनिधि व इसी गांव के निवासी रवि पासी ने इस बाबत जिले के मुख्य विकास अधिकारी को मांग पत्र दिया था
ग्रामवासी अखंड प्रताप, सच्चिनदानंद कश्यप, अतुल कुमार, दिनेश सरोज, पिंटू सिंह, हरिवंश वैरागी, मनोज यादव, कालिका गोंड़, मुकेश सरोज, राजा यादव, पंकज सरोज आदि ने भी शमशाबाद का ऐतिहासिक महत्व व कुटी के महात्म्य को देखते हुए ग्रामीण पर्यटक स्थल घोषित करने की मांग की है।




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