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संकीर्तन परिवार में होली पर लगती थी माह भर चौपाल

संकीर्तन परिवार में होली पर लगती थी माह भर चौपाल

•राजर्षि नगर दरौरा में जुटते थे अनेक दिग्गज गायक व वादक

•होली-चैता, भजन-सत्संग की सजती थी महफ़िल

•हजारों गायकों व वादकों से मिलकर हुई थी संकीर्तन परिवार की स्थापना

करहां (मऊ) : करहां परिक्षेत्र के राजर्षि नगर दरौरा स्थित सुप्रसिद्ध संकीर्तन परिवार में कभी होली का मौसम आते ही सुरों की चौपाल सज जाया करती थी। बसंत पंचमी से लेकर बुढ़वा मंगल तक फाग-चैता, होली-झूमर, भजन-कीर्तन और सत्संग की महफ़िलें पूरे माह चलती थीं। आत्मीय स्वागत-सत्कार, सामूहिक गायन और सेवा-भाव के बीच गांव-इलाके का सांस्कृतिक परिवेश जीवंत हो उठता था। बदलते समय और भागदौड़ भरी जीवनशैली के चलते अब यह परंपरा सिमटकर एक-दो दिन के औपचारिक आयोजन तक रह गई है।

संकीर्तन परिवार के प्रख्यात गायक व मुखिया चंद्रभान सिंह बताते हैं कि तत्कालीन परिवार प्रमुख स्वर्गीय राजा सिंह भजन-कीर्तन और संत्संग के प्रेमी थे। साधु-संतों, विप्र-भिक्षुकों, गायक-वादकों के स्वागत-सत्कार का भाव उनके व्यक्तित्व की पहचान था। उनके सान्निध्य में घर में भजन-कीर्तन की सशक्त टोली विकसित हुई, जिसका उद्देश्य सुमिरन और सेवाभाव रहा।

उन्होंने बताया कि धवरियासाथ के सम्मानित नागरिक स्वर्गीय प्रहलाद सिंह से संबंध प्रगाढ़ होने के बाद यह सांस्कृतिक चेतना और मजबूत हुई। इसी क्रम में संकीर्तन परिवार की स्थापना हुई, जिसका मुख्यालय बाबा दरबारी दास का आश्रम सिकठिया बना। एक माह तक प्रतिदिन सायंकाल क्षेत्र के अनेक गायक-वादक यहां जुटते, फाग-चैता और होली-झूमर की गायकी होती तथा आगंतुक नाश्ता-भोजन कर विश्राम करते थे।

कालांतर में दोनों विभूतियों के स्वर्गवास, बदलते सामाजिक ढांचे और व्यस्तताओं के कारण यह परंपरा क्षीण होती चली गई। चंद्रभान सिंह कहते हैं कि उस तरह की बैठकी और सामूहिक गायन की स्मृतियां आज भी मन को विचलित करती हैं, पर अब वैसा आयोजन संभव नहीं हो पाता।

मिली जानकारी के अनुसार, यहां स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती, महंत जगन्नाथ दास, संकीर्तनाचार्य स्व. देवनाथ महाराज, स्व. रामबचन तिवारी, केशव सिंह, बलवंत सिंह, त्रिलोकी प्रसाद, रामजनम सिंह, कमरुद्दीन अहमद, कालीचरण, सुधिराम, अरुण त्रिपाठी, प्रभुनाथ राम, संतोष द्विवेदी, रामजी तिवारी, कैलाश पांडेय जैसे अनेक ख्यातिप्राप्त गायक-वादक कभी इन महफ़िलों की शोभा बढ़ाते थे।

•संकीर्तन परिवार के तत्कालीन मुखिया स्व. राजा सिंह के अंदर राजा और ऋषि दोनो का संगम था। उनके रहते होली केवल रंगों का पर्व नहीं, सुर और संस्कार का उत्सव थी। माह भर चलने वाली चौपाल से गांव की एकता मजबूत होती थी। इस परंपरा को फिर से जीवित करने की जरुरत है।

◆अखिलानंद द्विवेदी, ढोल वादक, नगपुर

•यह परिवार हम सबका दूसरा घर था। बेहद अपनत्व के साथ संकीर्तन परिवार की होली और बैठकी से नई पीढ़ी को लोकगायन सीखने का अवसर मिलता था। यदि ऐसे आयोजन नियमित हों तो लोकसंगीत को नई ऊर्जा मिलेगी।

◆दुर्गविजय सिंह, लोक गायक, सद्दोपुर

•पता नहीं कितने दिन और रातें इस परिवार की आवभगत के साथ बीता है वह गिनने लायक नहीं। फाग-चैता की वह मिठास अब यादों में सिमटती जा रही है। सामूहिक प्रयास से ही इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाया जा सकता है। परिवार में गायकी की स्मृतियां आंखे नम कर जाती हैं।

◆कालीचरण सरोज, बिरहा गायक, दरौरा

•पिताजी के द्वारा स्थापित परंपरा के निर्वहन का भरपूर प्रयास आज भी जारी है, लेकिन भागदौड़ भरे जीवन में न तो उतने समय कोई आ पाता है और न ही उतनी गायकी हो पाती है। होली-चैता और कीर्तन हमारी पहचान हैं। संकीर्तन परिवार जैसी परंपराएं लौटें, तो गांवों में फिर से सुरों की रौनक बिखरेगी।

◆सुबाशंकर, कीर्तन गायक, राजर्षि नगर

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