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कभी होली, ध्रुपद-धमार का सांस्कृतिक केंद्र था मठ गुरादरी धाम

कभी होली, ध्रुपद-धमार का सांस्कृतिक केंद्र था मठ गुरादरी धाम

•ब्रह्मलीन महंत व संत जगन्नाथ साहब के निर्देशन में मिलती थी निश्शुल्क शिक्षा

•ख्यातिप्राप्त गायकों व शास्त्रीय संगीत साधकों का होता था बड़ा सम्मेलन

करहां (मऊ) : फागुन की दस्तक के साथ कभी करहां क्षेत्र का वातावरण ढोल-मजीरों की थाप, पखावज की गूंज और तानपुरे की गंभीर अनुगूंज से भर उठता था। मुहम्मदाबाद गोहना ब्लाक के करहां स्थित वैराग्याश्रम मठ गुरादरी धाम उस समय होली-फाग, चैता, ध्रुपद-धमार और खयाल गायकी का जीवंत केंद्र हुआ करता था।

इस सांगीतिक परंपरा के सूत्रधार थे ब्रह्मलीन संत जगन्नाथ साहब। उनके सान्निध्य में मठ परिसर नित्य हारमोनियम, तबला, मृदंग, पखावज और मजीरों की लय से गुंजायमान रहता था। कार्तिक पूर्णिमा, चैत्र रामनवमी, होली, दशहरा और दीपावली जैसे पर्वों पर यहां दूर-दराज से ख्यातिप्राप्त गायक और संगीत के प्रशिक्षु जुटते थे। दिन-रात ध्रुपद-धमार की गंभीरता और फाग की मस्ती का अद्भुत संगम देखने को मिलता था।

114 वर्ष की आयु में देह त्यागने वाले संत जगन्नाथ साहब संस्कृत, गीता, उपनिषद और शास्त्रीय संगीत के प्रकांड विद्वान थे। वे जीवन के अंतिम समय तक संगीत की निश्शुल्क शिक्षा देते रहे। उनके अनेक शिष्य आज देश के विभिन्न हिस्सों में शास्त्रीय और लोक संगीत की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके समय में प्रतिदिन होली-चैता, ध्रुपद-धमार तथा छोटे-बड़े खयाल का अभ्यास और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती थी।

उनके ब्रह्मलीन होने के बाद से वह सांगीतिक चहल-पहल थम सी गई है। वर्तमान महंत मानस धुरंधर भगवान दास महाराज रामकथा के मर्मज्ञ प्रवक्ता हैं, किंतु संगीत की विधाओं से उनका विशेष सरोकार न होने के कारण यह परंपरा अब विराम की स्थिति में है। क्षेत्रवासी आज भी उन सुरों और थापों को याद कर भावुक हो उठते हैं। फागुन की हवा आज भी करहां में बहती है, लेकिन गुरादरी मठ की वे सुरलहरियां जैसे किसी मधुर स्मृति में सिमट गई हैं। जरुरत है सामूहिक प्रयास की, ताकि होली के रंगों के साथ फिर से ध्रुपद और धमार की गूंज सुनाई दे सके।

•गुरादरी मठ हमारे लिए साधना स्थल था। वहां होली केवल रंगों का नहीं, सुरों का उत्सव होती थी। यदि उस परंपरा को फिर से शुरु किया जाए तो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।

-अरुण त्रिपाठी ‘मुन्ना’, लोकगायक, नगपुर

•संत जगन्नाथ साहब जैसा गुरु विरले ही मिलता है। उन्होंने ध्रुपद-धमार जैसी गंभीर विधाओं को गांव की चौपाल तक पहुंचाया। आज आवश्यकता है कि उस विरासत को संस्थागत रुप दिया जाए।

-चंद्रभान सिंह, कीर्तन गायक, राजर्षि नगर

गुरादरी धाम में होने वाली बैठकों में बड़े-बड़े उस्ताद शिरकत करते थे। वहां की साधना और अनुशासन ने कई कलाकारों को पहचान दी। यह केवल मठ नहीं, संगीत की पाठशाला था।

-अशोक महाराज, शास्त्रीय संगीत गायक, दक्षिण टोला, मऊ

•कहते हैं कि पहले फागुन में ढोल और पखावज की थाप से पूरा इलाका गूंजता था। अब वह रौनक कम हो गई है। यदि समाज आगे आए तो गुरादरी मठ फिर से होली और ध्रुपद-धमार का केंद्र बन सकता है।

-चंद्रशेखर मौर्य, संगीत साधक, करहां

•हम लोग पूर्ववर्ती महंत जी के शिष्य रहे। उन्होंने हमारी संगीत की शिक्षा के साथ अभिभावक के रुप के पालन-पोषण भी किया। उनके रहते यह क्षेत्र संगीत का एक घराना कहलाता था जो अब स्मृतिशेष बनकर सालता रहेगा।

-डाक्टर अंजनी तोमर, तबला प्रशिक्षु, रसूलपुर

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