ढोल-मंजीरों की थाप हुई मंद, फाग की सरगम अब यादों में
•बसंत के संग शुरू होने वाली फागुनी रौनक सिमटी एक दिन में
•पारंपरिक गीतों की जगह ले रहा शोरभरा संगीत
करहां (मऊ) : फागुन की दस्तक कभी गांवों की गलियों में ढोल-मंजीरों की थाप के साथ सुनाई देती थी। चौपालों पर फाग गूंजते थे, आंगनों में अबीर-गुलाल की खुशबू घुलती थी और 'होली खेले रघुबीरा अवध में' की मधुर तान पर कदम खुद-ब-खुद थिरक उठते थे। मगर बदलते समय की चकाचौंध में वह सजीव परंपरा अब धुंधली पड़ती जा रही है।
दो दशक पहले तक बसंत पंचमी के साथ ही होली की आहट शुरु हो जाती थी। सरसों के पीले फूल, आम की बौर और गुनगुनी हवाएं जैसे यह संदेश देती थीं कि फागुन आ गया। गांव-गांव फगुवा और चैता की टोलियां निकल पड़ती थीं। 'राधा संग श्याम खेलैं होरी', 'रंगवा लाले लाल', 'खेलें मसाने में होली दिगंबर' जैसे गीतों की गूंज देर रात तक सुनाई देती थी। परदेशी भी इस पर्व पर घर लौट आते थे, क्योंकि होली सिर्फ रंगों का नहीं, अपनत्व का उत्सव था।
अब हालात बदले हैं। होली का उल्लास एक-दो दिन की औपचारिकता तक सिमट गया है। ढोल-मंजीरे की जगह डीजे की कर्कश ध्वनि ने ले ली है। फाग और चैता की स्वच्छ परंपरा की जगह अशालीन गीतों का शोर बढ़ा है। होलिका दहन में भी लकड़ी और उपलों के स्थान पर टायर, पालीथिन व अन्य रासायनिक पदार्थ जलाए जाने लगे हैं, जिससे पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है।
समाज के जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते पारंपरिक लोकसंस्कृति को नहीं सहेजा गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही इन गीतों और रस्मों को पढ़ेंगी। समय की तेज रफ्तार में खोती जा रही फागुनी विरासत को बचाने के लिए समाज को मिलकर पहल करनी होगी, तभी ढोल-मंजीरों की वह पुरानी थाप फिर से गूंज सकेगी।
•पहले फाग की थाप पर गांव की एकजुटता दिखती थी। अब वाद्य यंत्रों की जगह तेज ध्वनि वाले स्पीकरों ने ले ली है। लोकसंगीत की साधना कम होती जा रही है, जो चिंता का विषय है।
◆रामजनम सिंह, तबला वादक, सद्दोपुर•होली जैसे पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। विद्यालयों और सामाजिक मंचों पर फाग-चैता की परंपरा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।
◆संतोष द्विवेदी, संगीत अध्यापक, बस्ती•पहले गांव की चौपालें कलाकारों के लिए मंच होती थीं। आज लोकगायकों को सुनने और सराहने वाले कम हो गए हैं। लोकधुनों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरुरी है।
◆सुधिराम पासवान, बिरहा गायक, दरौरा•होली केवल रंगों का नहीं, सुर और संस्कार का भी पर्व है। यदि लोग फिर से पारंपरिक गीतों और सादगी को अपनाएं, तो फागुन की असली मिठास लौट सकती है।
◆प्रभुनाथ राम, होली-चैता गायक, नगपुर







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