इस्लामी विद्वान मौलाना अल्लामा एहसान क़ासमी के इंतिकाल से शोक की लहर
करहां (मऊ) : करहां परिक्षेत्र के ग्राम दरौरा (नईबाज़ार) की सरज़मीं उस समय ग़मगीन हो उठी जब प्रख्यात इस्लामी विद्वान, आलिम-ए-दीन और सम्मानित धर्मगुरु हज़रत मौलाना व अल्लामा एहसान क़ासमी का शुक्रवार को इंतकाल हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। मस्जिदों, मदरसों और गलियों में हर जुबान पर अफ़सोस और हर आंख नम दिखाई दी।
मौलाना एहसान क़ासमी सिर्फ़ एक धर्मगुरु ही नहीं, बल्कि इल्म, अदब और इंसानियत की चलती-फिरती मिसाल थे। उनकी शख्सियत में सादगी की खुशबू, इल्म की रोशनी और रहमत का साया झलकता था। वे जिंदगी भर लोगों को मोहब्बत, अमन, सच्चाई और भाईचारे का पैग़ाम देते रहे। उनकी तकरीरों में ऐसी सादगी और असर होता था कि सुनने वाला खुद को बेहतर इंसान बनने की राह पर चलने को प्रेरित महसूस करता था।
उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस्लामी तालीम के प्रचार-प्रसार और समाज की भलाई के कामों में लगा दी। उनके सैकड़ों शागिर्द आज विभिन्न स्थानों पर दीन और समाज की सेवा कर रहे हैं। वे अक्सर कहा करते थे कि इल्म वह चिराग़ है जो अंधेरों को भी रास्ता दिखा देता है, और उन्होंने खुद अपनी पूरी जिंदगी उसी चिराग़ की तरह रोशन कर दी।
मौलाना क़ासमी का व्यक्तित्व विनम्रता, सेवा और करुणा का प्रतीक था। वे गरीबों के दुख में शामिल होते, लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याएँ सुनते और हर संभव मदद करने की कोशिश करते थे। यही कारण है कि समाज का हर वर्ग उन्हें बेपनाह सम्मान और मोहब्बत देता था।
उनके इंतिकाल से ऐसा लगता है जैसे इल्म का एक चमकता सितारा आसमान-ए-दीन से टूटकर बिछड़ गया हो। “कुछ लोग रुख़्सत होकर भी दिलों में ज़िंदा रहते हैं, उनकी बातें, उनकी यादें सदियों तक उजाला करती हैं।” मौलाना एहसान क़ासमी की दी हुई तालीम, उनके आदर्श और उनका सादा मगर महान जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए, उन्हें जन्नत-उल-फिरदौस में आला मक़ाम अता करे और उनके परिवारजनों, शिष्यों व चाहने वालों को इस गहरे दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे। नमाज़-ए-जनाज़ा शनिवार दोपहर 2:00 बजे अदा की जाएगी।

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