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फागुन की मुनादी के संग गूंजा शिवमय होली का संदेश

फागुन की मुनादी के संग गूंजा शिवमय होली का संदेश

करहां (मऊ) : फागुन के आगमन के साथ ही प्रकृति स्वयं जैसे होली की मुनादी कर देती है। जाड़े की कपकपी से मुक्त होकर जब लोग स्वेटर, कोट, दुशाला और रजाई समेट देते हैं, तब सरसों की पीली चादर, गेहूं की धानी चुनर और पलाश-टेसू के लाल फूल रंग और रस के इस महापर्व का निमंत्रण देने लगते हैं। कोयल की कूक और पपीहे की पुकार मानव मन में शृंगार का ऐसा मधुर रस घोलती है कि कदम स्वतः थिरक उठते हैं। होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि उन्मुक्तता, साफगोई, प्रेम और ममत्व का उत्सव है। ‘कबीर’ और ‘जोगीरा’ की स्वर लहरियों में जीवन की संचित चाह, डाह, ईर्ष्या और मनोमालिन्य को होलिका की अग्नि में समर्पित करने का संदेश छिपा है। वक्ताओं ने कहा कि यदि मन के विकारों का दहन न हुआ तो बाहरी आडंबरों के बीच भी होली का आत्मिक सुख अधूरा रह जाएगा।

फागुन का महीना भगवान शिव से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि और रंगभरी एकादशी, इन तीनों पड़ावों की डोर भोलेनाथ से आ मिलती है। बसंत पंचमी पर कामदेव दहन की कथा, शिवरात्रि पर माता गौरी से विवाह और रंगभरी एकादशी पर गौरा का गौना, इन प्रसंगों के माध्यम से शिव और शक्ति का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। महाशिवरात्रि की अलौकिक बारात हो या रंगभरी एकादशी पर भक्तों द्वारा बाबा के साथ रंग खेलने की परंपरा, हर दृश्य सामाजिक भेदभाव को पाटने का संदेश देता है। अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, पद-प्रतिष्ठा के सभी आडंबर इन दिनों मानो स्वयं ढह जाते हैं। किंतु यह उन्मुक्तता शालीनता और सम्मान की मर्यादा में ही शोभा देती है। बुजुर्गों का चरणस्पर्श, समवयस्कों से गले मिलना और छोटों को स्नेह देना, यही भारतीय होली की असली पहचान है।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि ‘मसाने की होली’ जैसी परंपराएं अपनी आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता के साथ जुड़ी हैं, जिन्हें साधारण जन को श्रद्धा और मर्यादा के साथ समझना चाहिए। सामान्य जन के लिए बाबा के धाम में भक्तिभाव से रंग खेलना ही श्रेष्ठ मार्ग है। असमानताओं के बीच संतुलन साधने वाले नटराज, गंगाधर, शशिधर और नीलकंठ भगवान शिव समता और कल्याण के प्रतीक हैं। कामना की गई कि उनकी कृपा से सभी की होली सुखमय, मंगलमय और समृद्धिकारक हो। फागुन की इस साहित्यिक व्याख्या ने उपस्थित जनों को यह संदेश दिया कि होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मन के शुद्धिकरण और सामाजिक समरसता का पर्व है।




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