श्रीराम-सीता विवाह के प्रसंग से गूंजा दुर्गा मंदिर परिसर
करहां (मऊ) : करहां परिक्षेत्र के तिलसवां स्थित दुर्गा मंदिर पर चल रही शतचंडी यज्ञ के चौथे बुधवार के दिन श्रीराम कथा के दौरान कथावाचक पंडित प्रमोद पांडेय कौशिकजी महाराज ने श्रीराम-सीता विवाह का अत्यंत मनोहारी और भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि मिथिला नगरी में राजा जनक द्वारा आयोजित स्वयंवर में समस्त दिशाओं के बलशाली राजा और वीर धनुष उठाने का प्रयास कर रहे थे, किंतु भगवान शिव का दिव्य धनुष कोई हिला तक न सका। सभा में सन्नाटा छा गया। तभी गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने विनम्रतापूर्वक धनुष को हाथ में लिया। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, धनुष गर्जना के साथ टूट गया और समूची सभा जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठी।
माता सीता ने हर्ष और श्रद्धा से भरकर श्रीराम के गले में जयमाला डाल दी। राजा जनक की आंखें आनंदाश्रु से भर उठीं। देवताओं ने पुष्पवर्षा की और आकाश मंगल ध्वनियों से मुखरित हो उठा। इसके पश्चात भगवान परशुराम का आगमन हुआ। उन्होंने शिव धनुष भंग होने पर क्रोध प्रकट किया, किंतु श्रीराम के तेज और विनम्रता को देखकर उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने प्रभु की दिव्यता को पहचानकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
इसके बाद अयोध्या से महाराज दशरथ सहित समस्त बारात मिथिला पहुंची। जनकपुरी को दुल्हन की भांति सजाया गया। मंगल गीतों, शहनाई और वेद मंत्रों के मध्य श्रीराम-सीता सहित चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ। कौशिक महाराज ने कहा कि यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा, प्रेम और समर्पण का अद्भुत संगम है, जो आज भी समाज को आदर्श जीवन की प्रेरणा देता है।

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