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परंपरा व प्रकृति से जुड़ें, मिट्टी के दीये जलाएं, ताकि माटीकला को मिले संबल

परंपरा व प्रकृति से जुड़ें, मिट्टी के दीये जलाएं, ताकि माटीकला को मिले संबल

•चाइनीज झालरों और आधुनिक लाइटों ने छीना कुम्हारों का निवाला, नई पीढ़ी दूसरे रोजगार की तलाश में

•बीमार पति के इलाज और परिवार की रोजी-रोटी का सहारा है मिट्टी के बर्तन बनाने का काम, लेकिन पहले जैसी नहीं रही मांग

करहां (मऊ) : दीपावली पर घर-आंगन को रोशन करने की परंपरा मिट्टी के दीयों से जुड़ी रही है। इन दीयों की लौ में जहां आस्था और संस्कृति की झलक मिलती है, वहीं प्रकृति और पारंपरिक माटीकला के संरक्षण का संदेश भी छिपा है। बदलते दौर में चाइनीज झालरों और आधुनिक लाइटों के बढ़ते प्रचलन ने कुम्हारों के पारंपरिक व्यवसाय को प्रभावित किया है। कभी गांव-गांव में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कई परिवार अब इस काम से दूर हो चुके हैं। ऐसे में परंपरा को जीवित रखने के लिए समाज और सरकार, दोनों स्तरों पर संरक्षण तथा प्रोत्साहन की जरुरत है।

◆करहां में कोशोरावस्था से मिट्टी के बर्तन बना रहे राधे प्रजापति इसका उदाहरण हैं। उनके मुताबिक पहले गांव में चार लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे, लेकिन अब वह अकेले रह गए हैं। परिवार का अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उम्रदराज होने के कारण उन्हें इलेक्ट्रानिक चाक नहीं मिला। बावजूद वह अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि कुम्हारों को सरकारी योजनाओं का लाभ, आधुनिक उपकरण और समाज का सहयोग मिले तो इस कला को फिर से मजबूती मिल सकती है।

◆चकजाफरी गांव के निहोर प्रजापति का परिवार भी इसी संघर्ष से गुजर रहा है। परिवार के मुखिया निहोर बीमार रहते हैं। उनकी पत्नी श्यामदुलारी देवी और बेटा नरेंद्र प्रजापति दूसरे के इलेक्टट्रानिक तथा पारंपरिक चाक की मदद से मिट्टी के बर्तन तैयार करते हैं। इसके बाद गांवों में घूमकर उन्हें बेचते हैं। श्यामदुलारी देवी बताती हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाना परिवार की रोजी-रोटी और बीमार पति के इलाज का सहारा है लेकिन अब पहले जैसी मांग नहीं रह गई है। मजबूरी में बेटा इस काम को आगे बढ़ा रहा है।

कमाई बढ़ी, लेकिन घट गई मांग

कारीगरों के सामने एक ओर मिट्टी, श्रम और अन्य लागत का दबाव है तो दूसरी ओर बाजार में पारंपरिक उत्पादों की मांग घटने की चुनौती। मिट्टी के बर्तनों की बिक्री से मिलने वाली कमाई पहले की अपेक्षा बढ़ी है, लेकिन ग्राहकों की संख्या और नियमित मांग में कमी ने कारोबार को प्रभावित किया है। नई पीढ़ी इस काम में भविष्य की संभावनाएं कम देखकर दूसरे रोजगार की ओर रुख कर रही है। नतीजतन, अनुभवी बुजुर्ग कारीगरों को अपनी कला आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी का पर्याप्त साथ नहीं मिल पा रहा है।

इलेक्टट्रानिक चाक और प्रशिक्षण की दरकार

कारीगरों का कहना है कि 50 वर्ष से अधिक उम्र के अनुभवी कुंभकारों को भी इलेक्टट्रानिक चाक जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरुरत है, ताकि शारीरिक श्रम कम हो और उत्पादन आसान बने। इसके साथ ही नई पीढ़ी को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था होनी चाहिए। स्थानीय मेलों, बाजारों और दीपावली जैसे त्योहारों पर मिट्टी के दीयों तथा अन्य उत्पादों की बिक्री के लिए विशेष अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

•अधिक उम्र, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और नई पीढ़ी का सहयोग नहीं मिलने के कारण उन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाना छोड़ दिया। उनका अनुभव बताता है कि पारंपरिक कला केवल हुनर से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, मेहनत और पारिवारिक सहयोग से आगे बढ़ती है।

-रामधनी प्रजापति, करहां

•मिट्टी के बर्तन बनाना एक कला है। इसे आज की पीढ़ी सीखना चाहे भी तो आसान नहीं है। आज शौक या मजबूरी में हम तो काम कर रहे हैं लेकिन आगे सबके सहयोग की आवश्यकता है। अन्यथा असहयोग के कारण कला मिट जाएगी।

-श्यामदुलारी देवी, चकजाफ़री

•मिट्टी के दीये स्थानीय कारीगरों की आजीविका को सहारा देने के साथ पारंपरिक संस्कृति को भी जीवित रखते हैं। इनका प्रयोग प्लास्टिक आधारित सजावटी सामान पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है। दीयों की लौ से कुछ कीट-पतंगे आकर्षित होकर नष्ट हो सकते हैं, हालांकि इसे पर्यावरणीय लाभ का प्रमुख आधार नहीं माना जाना चाहिए। वहीं, दीयों में इस्तेमाल होने वाले तेल या घी के दहन से भी कुछ धुआं और उत्सर्जन होता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए सीमित और सुरक्षित उपयोग, उचित वेंटिलेशन तथा प्रदूषण फैलाने वाली सजावटी सामग्री से बचना जरुरी है।

-नागेंद्र सिंह, समाजसेवी, करहां

•सामाजिक कार्यकर्ता स्कूलों, कालेजों, व्यापारिक संगठनों और गांवों में जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यदि प्रत्येक परिवार त्योहार पर कुछ दीये स्थानीय कारीगरों से खरीदे तो इससे उनकी आय बढ़ाने और पारंपरिक माटीकला को नई पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है। दीपावली की असली रोशनी तभी सार्थक होगी, जब घरों के साथ उन कारीगरों के जीवन में भी उजाला पहुंचे, जिनके हाथों से यह परंपरा पीढ़ियों से जीवित है।

-विष्णुकांत श्रीवास्तव, व्यापार मंडल अध्यक्ष, रसूलपुर

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