भागवत कथा की महारास लीला में गोपी भाव का किया गूढ़ निरुपण
कथा के दौरान आचार्य शुभम ने गोपी शब्द का गूढ़ अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि गोभिः इन्द्रियैः कृष्ण रसं पिबति इति गोपी, अर्थात जो अपनी समस्त इन्द्रियों से निरंतर श्रीकृष्ण का ही रस पान करे, वही सच्ची गोपी है। उन्होंने बताया कि जब तक जीवात्मा और परमात्मा के बीच माया का सूक्ष्म आवरण बना रहता है, तब तक जीव महारास जैसे दिव्य आनंद का अधिकारी नहीं बन पाता। प्रभु की कृपा से ही यह आवरण हटता है।
आचार्य ने गोपीगीत का मार्मिक वर्णन करते हुए अक्रूरजी के वृंदावन आगमन, भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा प्रवेश, कुब्जा पर कृपा, धनुषभंग लीला तथा कंस वध के प्रसंगों को विस्तार से सुनाया। उन्होंने बताया कि कंस के वध के बाद भगवान ने वसुदेव-देवकी को कारागार से मुक्त कर उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया। आगे महर्षि संदीपनी के आश्रम में श्रीकृष्ण द्वारा शिक्षा ग्रहण करने और गुरुदक्षिणा स्वरुप गुरु पुत्र को मृत्यु के मुख से वापस लाकर गुरुमाता को सौंपने की लीला का भी वर्णन किया गया। साथ ही श्रीकृष्ण एवं माता रुक्मिणी के दिव्य परिणय प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। कथावाचक ने कहा कि परमात्मा किसी का हरण नहीं करते, बल्कि अपने प्रेम से उसे अपनाते हैं।

Post a Comment